उदासी का साया
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: ग़म, हम, कम, नम, दम | Radeef: है
दिल में अब बस उदासी का ही आलम है,
आँखों में हर घड़ी एक नया ग़म है।
कैसे जिएँ भला हम इस बेदर्द दुनिया में,
जब हर खुशी का पल भी लगता कम है।
लफ़्ज़ों में छिपी है एक गहरी ख़ामोशी,
होठों पे हँसी है पर आँखें नम है।
'फ़ुरक़ान' अब तो बस साँसों का सिलसिला है,
जीने की आरज़ू में भी टूटा दम है।
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: निशाँ, कहाँ, जुबाँ, फ़ना, जहाँ | Radeef: है
आज भी दिल पर तेरी यादों का निशाँ है,
तू तो चला गया, पर तेरा दर्द कहाँ है।
लब पे आते नहीं अब कोई भी अल्फ़ाज़,
बस खामोशी ही मेरी अब तो जुबाँ है।
ज़िंदगी कट रही है बस तेरी चाहत में,
क्या बताऊँ तुझे, मेरा कैसा ये जहाँ है।
'फ़ुरक़ान' अब तो बस मौत का इंतज़ार है,
इश्क़ में होकर हम तो यूँ ही फ़ना है।
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: ख़ामोशी, बेख़ुदी, उदासी, कमी, खुशी | Radeef: है
दिल में अब एक अजीब सी ख़ामोशी है,
आँखों में उतर आई गहरी उदासी है।
कोई सुनता नहीं अब मेरी सिसकियों को,
दुनिया की नज़रों में मेरी बेख़ुदी है।
हर तरफ़ अब मुझे बस अँधेरा ही दिखे,
रोशनी की अब दिल में कितनी कमी है।
'फ़ुरक़ान' ये दर्द अब सहना भी मुश्किल है,
क्या पता फिर कभी आए या ना आए ये खुशी है।