Key Highlights

  • 'अस्सलाम वालेकुम' को भारतीय सांस्कृतिक शब्दकोश का हिस्सा बताया गया है।
  • यह केवल एक धार्मिक अभिवादन नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव का प्रतीक भी है।
  • भारत के भाषाई ताने-बाने में कई शब्द धर्म की सीमाएं लांघकर शामिल हुए हैं।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विभिन्न संस्कृतियाँ और भाषाएँ आपस में घुलती-मिलती रही हैं। इसी विविधता के बीच एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आई है कि 'अस्सलाम वालेकुम' सिर्फ़ एक धार्मिक संबोधन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक शब्दकोश का एक अभिन्न अंग है। इस वाक्यांश को केवल एक धर्म से जोड़कर देखना इसकी व्यापकता को कम करना है। यह दशकों से भारतीय समाज के ताने-बाने में बुना हुआ है।

भारतीय समाज में 'अस्सलाम वालेकुम' की सांस्कृतिक जड़ें

यह बात सिर्फ़ भाषाविदों या इतिहासविदों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनजीवन में भी महसूस की जा सकती है। 'अस्सलाम वालेकुम' का अर्थ है 'आप पर शांति हो'। यह एक शुभकामना है। भारत में कई ऐसे शब्द हैं जिन्होंने अपनी मूल धार्मिक या क्षेत्रीय पहचान से परे एक व्यापक सांस्कृतिक स्वीकृति हासिल की है। 'नमस्ते', 'नमस्कार', 'सलाम' और 'जय हिंद' जैसे अभिवादन इसी श्रेणी में आते हैं। 'अस्सलाम वालेकुम' को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह सिर्फ़ कुछ लोगों का नहीं, बल्कि एक बड़े वर्ग का परिचित संबोधन है।

भाषाई संगम और साझा विरासत

भारत की भाषाई विरासत संगम की तरह है। यहाँ संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, हिंदी और कई क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द एक दूसरे में रच-बस गए हैं। 'अस्सलाम वालेकुम' अरबी मूल का शब्द ज़रूर है, पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसके प्रचलन ने इसे एक साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना दिया है। दरगाहों, बाज़ारों, मुहल्लों और यहाँ तक कि अनौपचारिक बातचीत में भी यह शब्द आसानी से सुनाई देता है। यह किसी एक समुदाय की पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का एक सहज तरीक़ा बन गया है।

धर्मनिरपेक्ष देश में शब्दों की भूमिका

एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत की पहचान इसकी विविधता में एकता से है। यहाँ के लोग अलग-अलग तरीक़ों से एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। शब्दों का अपना जीवन होता है। वे समय के साथ विकसित होते हैं, नए अर्थ ग्रहण करते हैं और सांस्कृतिक सीमाओं को पार करते हैं। 'अस्सलाम वालेकुम' को केवल एक धार्मिक लेबल तक सीमित करना, भारत की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत की समझ को कमज़ोर करता है। इसे शांति और सद्भाव के एक व्यापक प्रतीक के रूप में देखना अधिक प्रासंगिक है। इससे आपसी भाईचारे और सौहार्द को बढ़ावा मिलता है।

व्यापक स्वीकार्यता की आवश्यकता

यह समय की माँग है कि हम अपने सांस्कृतिक शब्दकोश को व्यापक नज़रिए से देखें। 'अस्सलाम वालेकुम' जैसे शब्द जो सदियों से भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं, उन्हें केवल धार्मिक दायरे में समेटना अनुचित है। यह हमारी साझा पहचान, हमारे मिलनसार स्वभाव और हमारी सांस्कृतिक उदारता का प्रतीक है। इस शब्द की स्वीकार्यता सिर्फ़ धर्म से नहीं, बल्कि भारत की उस गंगा-जमुनी तहज़ीब से जुड़ी है, जो इसे सचमुच अविश्वसनीय बनाती है।

Share Your Opinion!

क्या आप भी मानते हैं कि 'अस्सलाम वालेकुम' भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है? इस पर अपनी राय हमारे साथ साझा करें। अधिक विस्तृत समाचार कवरेज के लिए, Vews.in पर आते रहें।