Key Highlights

  • केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।
  • वीडियो में उन्हें कथित तौर पर बीजेपी के खिलाफ बयान देते दिखाया गया था।
  • जाँच में सामने आया कि यह वीडियो डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल करके बनाया गया है।

वायरल डीपफेक वीडियो की सच्चाई

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ बयान देते हुए एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब साझा किया जा रहा है। यह क्लिप तेजी से वायरल हुई, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। हालाँकि, पड़ताल में पता चला है कि यह वीडियो पूरी तरह से फर्जी है। इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डीपफेक तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है, जिसका मकसद भ्रम फैलाना और गलत सूचना देना है।

कैसे किया गया AI तकनीक का दुरुपयोग?

वायरल वीडियो में धर्मेंद्र प्रधान को कथित तौर पर भाजपा की नीतियों और कामकाज की आलोचना करते हुए दिखाया गया है। उनकी आवाज और हावभाव भी वास्तविक लग रहे थे, जिससे कई लोग इसे सच मान बैठे। विशेषज्ञों और फैक्ट-चेकर्स ने वीडियो की बारीकी से जांच की। उन्होंने पाया कि इसमें आवाज और चेहरे के मूवमेंट को सिंक्रोनाइज करने में विसंगतियां हैं, जो डीपफेक का स्पष्ट संकेत देती हैं। यह तकनीक किसी व्यक्ति के चेहरे और आवाज का इस्तेमाल कर ऐसे वीडियो बनाती है, जिसमें वह कुछ ऐसा बोलता या करता दिख रहा होता है जो उसने कभी किया ही नहीं।

राजनीति में डीपफेक का बढ़ता खतरा

यह कोई अकेला मामला नहीं है। हाल के दिनों में ऐसे कई डीपफेक वीडियो सामने आए हैं, जिनमें राजनेताओं को गलत बयानी करते दिखाया गया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का भी एक ऐसा ही डीपफेक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्हें आपत्तिजनक टिप्पणी करते दिखाया गया था। चुनाव के माहौल में ऐसे वीडियो राजनीतिक दुष्प्रचार का एक नया हथियार बन गए हैं। वे मतदाताओं को गुमराह करने और सार्वजनिक राय को प्रभावित करने का काम करते हैं।

💡 Did You Know? डीपफेक शब्द 'डीप लर्निंग' और 'फेक' से मिलकर बना है। यह एक ऐसी AI तकनीक है जो किसी व्यक्ति के वीडियो, इमेज या ऑडियो को हेरफेर करके एक नया, नकली वीडियो या ऑडियो बनाती है जो वास्तविक लगता है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार इस खतरे के प्रति आगाह कर रहे हैं। उनका मानना है कि डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग न केवल व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए भी गंभीर चुनौती पैदा करता है। सरकार और तकनीकी कंपनियों को मिलकर इससे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। लोगों को भी किसी भी वायरल वीडियो या सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता जांचने की सलाह दी जाती है।

डिजिटल युग में सत्य और असत्य के बीच अंतर करना अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली हर जानकारी पर संदेह करना और उसकी पुष्टि करना हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है।

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