Key Highlights

  • मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में भारतीय समुदाय को संबोधित किया।
  • उन्होंने 'कर्मभूमि' के प्रति वफादारी पर विशेष जोर दिया।
  • 'विविधता में एकता' को भारत का राष्ट्रीय डीएनए बताया।

कर्मभूमि के प्रति निष्ठा: न्यूयॉर्क से महत्वपूर्ण संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में न्यूयॉर्क में भारतीय समुदाय को संबोधित किया। उनके इस संबोधन का मुख्य बिंदु 'कर्मभूमि' के प्रति वफादारी पर केंद्रित रहा। भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि व्यक्ति जिस स्थान पर रहता है, कार्य करता है, वही उसकी कर्मभूमि है। उस भूमि के प्रति निष्ठा और समर्पण अनिवार्य है। यह संदेश प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक रहा।

भारत के डीएनए में विविधता में एकता

भागवत ने भारत की पहचान को 'विविधता में एकता' के शाश्वत सिद्धांत से जोड़ा। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि भारत के 'डीएनए' का हिस्सा है। उन्होंने जोर दिया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत विभिन्नताओं से भरी है। यही अनेकता इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सरसंघचालक ने सभी से अपनी जड़ों से जुड़े रहने और भारतीय मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। यह एक ऐसा विचार है जो सदियों से भारतीय दर्शन का मूल रहा है।

💡 Did You Know? आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को एकजुट करना था।

उन्होंने वैश्विक पटल पर भारतवंशियों की भूमिका को भी रेखांकित किया। भागवत ने कहा कि भारतीय समुदाय जहां भी रहते हैं, अपनी मेहनत और मूल्यों से उस समाज में योगदान करते हैं। साथ ही, उन्हें अपनी भारतीय पहचान और संस्कृति को भी बनाए रखना चाहिए। उनके संबोधन ने उपस्थित लोगों में राष्ट्र गौरव और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना को मजबूत किया।

सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय गौरव

मोहन भागवत ने भारतीय संस्कृति और मूल्यों के संरक्षण पर बल दिया। उनका मानना है कि भौगोलिक सीमाओं से परे, भारतीय अपनी सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर चलते हैं। इस संबोधन का उद्देश्य प्रवासी भारतीयों को अपनी 'कर्मभूमि' के प्रति निष्ठावान रहते हुए भी भारतीयता के सार को जीवित रखने के लिए प्रेरित करना था। यह राष्ट्रीय एकता और वैश्विक सद्भाव का एक महत्वपूर्ण संदेश था।

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