भारत की पश्चिम एशिया नीति का बदलता स्वरूप: नेतन्याहू या खामेनेई नहीं, असली वजह है ‘यूएई’
वैश्विक भू-राजनीति में पश्चिम एशिया हमेशा से ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। भारत की विदेश नीति, विशेषकर इस क्षेत्र के प्रति, लगातार विकसित हो रही है। हाल के घटनाक्रमों के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पश्चिम एशिया से जुड़े फैसलों और भारत के रुख को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। आमतौर पर विश्लेषक इसे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू या ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के प्रभाव से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अब एक चौंकाने वाला सच सामने आ रहा है: इस सब के पीछे की असली धुरी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) है।
यह दावा सिर्फ अटकलें नहीं, बल्कि भारत और यूएई के बीच गहराते आर्थिक, सामरिक और राजनयिक संबंधों पर आधारित है। भारत की पश्चिम एशिया नीति अब केवल संतुलन साधने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सक्रिय रूप से अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने और क्षेत्रीय स्थिरता में भागीदार बनने की नीति है, जिसमें यूएई एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
क्यों ‘यूएई’ बना असली धुरी?
यूएई सिर्फ एक तेल उत्पादक देश नहीं, बल्कि एक महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय शक्ति है जो आर्थिक विविधीकरण और वैश्विक साझेदारी पर जोर दे रही है। भारत के लिए यूएई का महत्व कई गुना बढ़ गया है, जो पारंपरिक धारणाओं से कहीं आगे है।
आर्थिक हित और निवेश
- ऊर्जा सुरक्षा: यूएई भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति करता है।
- व्यापार और निवेश: भारत और यूएई के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा है। यूएई भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, विशेषकर बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में। दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने व्यापार को और गति दी है।
- प्रवासी भारतीय: यूएई में लाखों भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो भारत को भारी मात्रा में रेमिटेंस भेजते हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
सामरिक साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता
- रक्षा सहयोग: भारत और यूएई रक्षा क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा रहे हैं, जिसमें संयुक्त अभ्यास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और खुफिया जानकारी साझा करना शामिल है।
- आतंकवाद विरोधी मोर्चा: दोनों देश आतंकवाद और चरमपंथ से निपटने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं, जो क्षेत्र और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
- क्षेत्रीय दृष्टिकोण का तालमेल: भारत और यूएई दोनों ही पश्चिम एशिया में स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के इच्छुक हैं। यूएई, जो स्वयं को एक व्यापार और कूटनीतिक केंद्र के रूप में देखता है, चाहता है कि क्षेत्र में संघर्षों के बजाय सहयोग बढ़े।
'आई2यू2' और नए गठबंधन का उदय
'आई2यू2' (इंडिया, इजरायल, यूएई, यूएसए) जैसे नए क्षेत्रीय समूह का गठन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कैसे यूएई, इजरायल और भारत को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह समूह आर्थिक सहयोग, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रौद्योगिकी साझाकरण पर केंद्रित है। इस मंच पर यूएई की सक्रियता दर्शाती है कि वह सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के नए भू-आर्थिक ढांचे का एक वास्तुकार है, और भारत इस प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है।
इजरायल और ईरान का पहलू: क्या भारत सिर्फ 'कवर' है?
भारत के इजरायल और ईरान दोनों के साथ ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण संबंध हैं। यूएई के प्रभाव को समझने के लिए इन संबंधों की गतिशीलता को भी देखना होगा।
इजरायल की बदलती रणनीति
हाल के दिनों में इजरायल की ईरान नीति में एक स्पष्ट बदलाव देखा गया है। जहां पहले नेतन्याहू सरकार ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात करती थी, वहीं अब उसका ध्यान ईरान के परमाणु ठिकानों को निष्क्रिय करने पर अधिक है, चाहे इसके लिए उसे अमेरिका के समर्थन के बिना ही कार्रवाई क्यों न करनी पड़े। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत के साथ इजरायल की बढ़ती निकटता को इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है। यह संभावना भी जताई गई है कि इजरायल भारत को एक कूटनीतिक 'कवर' के रूप में इस्तेमाल कर रहा हो, जिससे उसे अपने क्षेत्रीय विरोधियों के खिलाफ एक मजबूत स्थिति बनाने में मदद मिल सके। हालांकि, भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और वह किसी भी देश के लिए 'कवर' नहीं है। भारत के इजरायल के साथ संबंध उसकी अपनी रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों पर आधारित हैं, जिसमें यूएई के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी शामिल है।
ईरान के साथ संतुलन
भारत के ईरान के साथ भी गहरे संबंध हैं, विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना के माध्यम से जो भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करती है। भारत ने हमेशा ईरान के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक संतुलित किया है, ताकि उसके ऊर्जा हितों और क्षेत्रीय संपर्क की आवश्यकताएं पूरी हो सकें। यूएई के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करते हुए भी, भारत ने ईरान को पूरी तरह से अलग नहीं किया है, जो उसकी बहु-संरेखण नीति का हिस्सा है।
निष्कर्ष: भारत की दूरदर्शी कूटनीति
निष्कर्षतः, प्रधानमंत्री मोदी के पश्चिम एशिया नीतिगत रुख को केवल नेतन्याहू या खामेनेई के सीधे प्रभाव से देखना एक अधूरी तस्वीर होगी। इसके बजाय, यह यूएई के साथ भारत के गहरे और बहुआयामी संबंधों का परिणाम है। यूएई भारत के लिए सिर्फ एक आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक सहयोगी बन गया है जो क्षेत्रीय स्थिरता, आतंकवाद विरोधी प्रयासों और नए भू-आर्थिक गठबंधनों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत की विदेश नीति अब एकतरफा नहीं, बल्कि बहुपक्षीय और दूरदर्शी है, जो अपने राष्ट्रीय हितों को अधिकतम करने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता रखती है। यह एक ऐसी रणनीति है जो बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका को मजबूत कर रही है।