प्रमुख बातें
- 1979 के मक्का ग्रैंड मस्जिद घेराव में शामिल एक प्रमुख सऊदी कमांडर का निधन।
- इस घटना ने सऊदी अरब और दुनिया भर में गहरा प्रभाव डाला था।
- घेराव को समाप्त करने के लिए जटिल सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता पड़ी थी।
मक्का की पवित्र भूमि पर छाया था आतंक का साया
सालों पहले, 45 साल पहले, सऊदी अरब की पवित्र भूमि, मक्का की ग्रैंड मस्जिद में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। आज, उस भयावह घटना के पीछे के प्रमुख व्यक्तियों में से एक, एक सऊदी कमांडर, जिसने उस गंभीर घेराव का नेतृत्व किया था, उसका निधन हो गया है। यह घटना न केवल सऊदी अरब के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर सुरक्षा और धार्मिक संवेदनशीलता के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई थी।
वो 1979 की सर्द रातें: जब आतंकवाद ने ली पवित्र स्थान में शरण
यह 20 नवंबर, 1979 की तारीख थी, जब हज के पवित्र दिन के ठीक बाद, जुहैमान अल-उतैबी के नेतृत्व वाले चरमपंथियों के एक समूह ने मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया। उन्होंने मस्जिद के अंदर हजारों नमाजियों को बंधक बना लिया। इन कट्टरपंथियों की मांग थी कि तत्कालीन सऊदी सरकार को उखाड़ फेंका जाए और देश में इस्लामी कानून की कठोर व्याख्या लागू की जाए। उन्होंने खुद को 'इमाम महदी' घोषित किया और अपने समर्थकों से मस्जिद में शामिल होने का आह्वान किया।
सालों की खामोशी के बाद उठी खबर: कमांडर का अंत
अल-उतैबी, जो इस पूरी कार्रवाई के प्रमुख सूत्रधारों में से एक था, अब नहीं रहा। उसके निधन की खबर ने एक बार फिर उस काले अध्याय को ताज़ा कर दिया है। यह घेराव करीब दो हफ्तों तक चला, जिसमें भीषण गोलीबारी और बंधकों की रिहाई के लिए लगातार प्रयास जारी रहे। इस घटना में सैकड़ों लोगों की जान गई थी, जिनमें मस्जिद के इमाम भी शामिल थे।
दीर्घकालिक प्रभाव: एक राष्ट्र की सुरक्षा पुनर्रचना
मक्का मस्जिद घेराव के बाद, सऊदी अरब ने अपनी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में भारी फेरबदल किए। देश ने धार्मिक उग्रवाद से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए और अपनी खुफिया तंत्र को मजबूत किया। इस घटना ने इस्लामी दुनिया में भी चिंता की लहरें पैदा कीं और कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे की ओर इशारा किया। यह घटना आज भी एक गंभीर अनुस्मारक के रूप में खड़ी है कि कैसे धार्मिक आस्था को चरमपंथ का हथियार बनाया जा सकता है।
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