उदासी का सफर

Ghazal By Furkan S Khan

Kaafiya: आती, जाती

Radeef: नहीं


ये कैसी रात है, नींद भी आती नहीं,
तेरी यादों से ये आँखें भर जाती नहीं।

हर तरफ़ फैला है ग़म का घना अंधेरा,
रोशनी की कोई उम्मीद नज़र आती नहीं।

दर्द की ये कैसी अनकही है कहानी,
होंठों पे मेरे अब हँसी भी आती नहीं।

तेरा जाना था जैसे एक गहरी निशानी,
लौट के तू फिर कभी वापस आती नहीं।



Ghazal By Furkan S Khan

Kaafiya: बताएं, बचाएं, सताएँ, मिटाएँ

Radeef: क्या करें


हाल-ए-दिल किसको जा के बताएं, क्या करें,
खुद को कैसे इस ग़म से बचाएं, क्या करें।

हर खुशी हमसे रूठी, हर गम ने हमें घेरा,
यादें तेरी अब भी हर पल सताएँ, क्या करें।

उम्मीदों के दिए हमने खुद ही बुझाए,
अब किस रौशनी की आस लगाएँ, क्या करें।

ये इश्क़ की आग है जो जलाती रहे रात भर,
इस दिल की तड़प को कैसे मिटाएँ, क्या करें।



Ghazal By Furkan S Khan

Kaafiya: गहरा, घेरा, चेहरा, डेरा, अंधेरा

Radeef: है


ये कैसा ग़म है जो अंदर तक गहरा है,
हर तरफ़ खामोशी का इक घना घेरा है।

कोई समझे न मेरे दिल की उलझन को,
हर सवाल पे बस एक खाली चेहरा है।

जिन रास्तों पे चला मैं कभी खुशियों से,
आज उन पे उदासी का ही डेरा है।

रात भर जाग के बस यही सोचा मैंने,
क्या मेरी क़िस्मत में अब सिर्फ़ अंधेरा है।