दर्द का सफर
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: पता, सज़ा, हवा, वजह, बचा, फलसफा, जला, शिफा
Radeef: क्या है
दिल में जो दर्द है, उसका कहाँ पता क्या है?
हर एक साँस में घुला, ये कैसा सज़ा क्या है?
वीरानियों में भटकती फिरती है ये हवा क्या है?
मुझसे रूठा है ज़माना, इसकी वजह क्या है?
अब तो कुछ भी नहीं मुझमें, जो कभी बचा क्या है?
ज़िंदगी तू ही बता, तेरा ये फ़लसफ़ा क्या है?
फ़ुरक़त में तेरी 'फ़ुरक़ान', ये दिल जला क्या है?
हर दर्द की दवा में भी, अब कोई शिफ़ा क्या है?
हर एक साँस में घुला, ये कैसा सज़ा क्या है?
वीरानियों में भटकती फिरती है ये हवा क्या है?
मुझसे रूठा है ज़माना, इसकी वजह क्या है?
अब तो कुछ भी नहीं मुझमें, जो कभी बचा क्या है?
ज़िंदगी तू ही बता, तेरा ये फ़लसफ़ा क्या है?
फ़ुरक़त में तेरी 'फ़ुरक़ान', ये दिल जला क्या है?
हर दर्द की दवा में भी, अब कोई शिफ़ा क्या है?
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: गहरी, ठहरी, लहरी, ज़हरी, पहरी, बहरी
Radeef: है
ज़िंदगी की राहों में, एक उदासी गहरी है।
आँखों में नमी है पर, लबों पे चुप्पी ठहरी है।
दिल में जो दर्द उठा, उसकी न कोई लहरी है।
हर आह में छिपी, एक दास्तान ज़हरी है।
रातें हैं बेक़रार, दिन भी ये कैसे ठहरी है।
हर पल में ये तन्हाई, मुझपे क्यों पहरी है।
'फ़ुरक़ान' की कलम से, ये ग़ज़ल जो बहरी है।
हर लफ़्ज़ में अश्कों की, एक नदी तो गहरी है।
आँखों में नमी है पर, लबों पे चुप्पी ठहरी है।
दिल में जो दर्द उठा, उसकी न कोई लहरी है।
हर आह में छिपी, एक दास्तान ज़हरी है।
रातें हैं बेक़रार, दिन भी ये कैसे ठहरी है।
हर पल में ये तन्हाई, मुझपे क्यों पहरी है।
'फ़ुरक़ान' की कलम से, ये ग़ज़ल जो बहरी है।
हर लफ़्ज़ में अश्कों की, एक नदी तो गहरी है।