इस कार्रवाई की जड़ें वर्ष 2002 से जुड़ी हैं, जब तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ने जांच के बाद पाया था कि रसूल शाह बसवारी दरगाह से सटे हुए 10 अतिरिक्त मजार अवैध रूप से बनाए गए हैं। उसी समय इन्हें हटाने का आदेश जारी किया गया था। हालांकि, प्रबंध समिति द्वारा लगातार अपीलें दायर किए जाने के कारण यह मामला वर्षों तक लंबित रहा।
नोटिस के बावजूद नहीं हटाए गए अवैध ढांचे
शहर के सिटी मजिस्ट्रेट राजेश प्रसाद ने जानकारी दी कि 10 जनवरी को दरगाह की प्रबंध समिति को औपचारिक नोटिस जारी कर 17 जनवरी तक स्वेच्छा से अवैध मजार हटाने के निर्देश दिए गए थे। तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर प्रशासन ने सोमवार को बुलडोजर कार्रवाई की।
प्रशासन और पुलिस बल की रही मौजूदगी
ध्वस्तीकरण के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। तीन थानों की पुलिस फोर्स के साथ एएसपी सिटी अशोक सिंह, नगर पालिका की अधिशासी अधिकारी प्रमिता सिंह और एसडीएम (सदर) पूजा चौधरी मौके पर मौजूद रहीं। प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे अभियान की निगरानी की ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।
मूल दरगाह सुरक्षित, केवल अवैध मजार हटाईं
प्रशासन ने स्पष्ट किया कि सदियों पुरानी रसूल शाह बसवारी की असली ‘आस्ताना’ और उससे जुड़ी दो मजारें पूरी तरह वैध हैं और वक्फ बोर्ड में पंजीकृत हैं। इन्हें किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया गया। कार्रवाई केवल उन्हीं 10 मजारों पर की गई, जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया के तहत अवैध घोषित किया जा चुका था।
2019 में भी बरकरार रहा था अवैध घोषित करने का फैसला
प्रबंध समिति ने पहले 2004 में जिलाधिकारी के समक्ष अपील की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला मंडलायुक्त के पास पहुंचा, जहां करीब 15 वर्षों की सुनवाई के बाद 2019 में मूल आदेश को सही ठहराया गया। इसके बावजूद अवैध ढांचे हटाए नहीं गए थे।
मेडिकल कॉलेज बनने के बाद बढ़ी कार्रवाई की जरूरत
वर्ष 2023 में महाराजा सुहेलदेव मेडिकल कॉलेज की स्थापना के बाद यह पूरा क्षेत्र सरकारी संस्थान की परिसीमा में आ गया। इसके चलते अवैध निर्माणों को हटाना आवश्यक हो गया था। अधिकारियों ने दोहराया कि यह कदम किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि कानून के पालन के लिए उठाया गया है।
शांति व्यवस्था बनी रही
प्रशासन के अनुसार पूरी कार्रवाई के दौरान किसी भी तरह की हिंसा या अव्यवस्था की सूचना नहीं मिली। स्थानीय लोगों से भी सहयोग मिला और अभियान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
निष्कर्ष: बहराइच प्रशासन की यह कार्रवाई एक संदेश है कि सरकारी ज़मीन पर अवैध निर्माण, चाहे वे किसी भी प्रकार के हों, कानून के दायरे से बाहर नहीं हैं। वर्षों पुराने मामलों में भी जब अंतिम फैसला आ जाता है, तो उसे लागू किया जाएगा।