इश्क़ का दस्तूर: फ़ुरकान एस ख़ान की प्रेम ग़ज़ल

फ़ुरकान एस ख़ान द्वारा रचित 'इश्क़ का दस्तूर' ग़ज़ल में प्रेम की गहराई और दीवानगी को महसूस करें। दिल, मुश्किल, घायल, साहिल पर केंद्रित यह ग़ज़ल मोहब्बत की दास्तान बयां करती है।

Sunday, August 23, 2026
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इश्क़ का दस्तूर: फ़ुरकान एस ख़ान की प्रेम ग़ज़ल
“इश्क़ का दस्तूर: फ़ुरकान एस ख़ान की प्रेम ग़ज़ल”
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23 August 2026
इश्क़ का दस्तूर: फ़ुरकान एस ख़ान की प्रेम ग़ज़ल
Ghazal
जब से लगी ये आग सीने में, दिल अब क्या करें हर साँस में बस नाम तेरा, मुश्किल अब क्या करें तेरी नज़र का तीर जो लगा, घायल अब क्या करें नैनों से बहते अश्क के मोती, साहिल अब क्या करें तेरी यादों में खोए रहते हैं, हासिल अब क्या करें दुनिया की हर रस्म-ओ-रिवाज, क़ाबिल अब क्या करें 'फ़ुरकान' कहाँ जाए अब छोड़ के, मंज़िल अब क्या करें तेरी ही गली में अपना ठिकाना, साहिल अब क्या करें
Kaafiya दिल, मुश्किल, घायल, साहिल, हासिल, क़ाबिल, मंज़िल Radeef अब क्या करें
F Poetry ByFurkan S Khan
Ghazal
जब याद तेरी दिल में, बनके एक सौग़ात आती है हर साँस में बस तेरी ही अब तो बात आती है अंधेरी शब में भी, रौशनी सी साथ आती है तेरी हँसी की गूँज, कानों में जब रात आती है क्या बताऊँ हाल-ए-दिल, जब तू न पास आती है हर आरज़ू अधूरी, हर दुआ तब याद आती है 'फ़ुरकान' की हर ग़ज़ल में, तेरा ही ज़िक्र रहता है जब लबों पे तेरा नाम, एक मुराद बनके आती है
Kaafiya सौग़ात, बात, साथ, रात, याद, मुराद Radeef आती है
F Poetry ByFurkan S Khan

इश्क़ का दस्तूर

Ghazal By Furkan S Khan

Kaafiya: दिल, मुश्किल, घायल, साहिल, हासिल, क़ाबिल, मंज़िल

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News Desk
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