गम का साया
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: खो, सो, रो, बो, हो | Radeef: गया
दिल का हर सुकून अब तो खो गया,
आँखों का वो नूर भी सो गया।
हँसने का अंदाज़ अब तो रो गया,
हर दर्द अब रूह में बो गया।
क्या कहूँ अब हाल-ए-दिल किसी से,
जो था कभी अपना, वो पराया हो गया।
'फुरकान' अब तो जीने का सबब भी,
गम की चादर ओढ़कर सो गया।
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: दर्द, सर्द, बेदर्द | Radeef: है
दिल में छुपा इक गहरा दर्द है,
मौसम-ए-गम भी कितना सर्द है।
कौन समझे मेरे इस हाल को,
हर शख्स अब तो बेदर्द है।
रोशनी भी अब तो धुंधली सी है,
हर तरफ बस एक ही दर्द है।
'फुरकान' अब ये कैसी रुसवाई है,
हर खुशी भी अब तो बेदर्द है।