ज़िंदगी की पहेली

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: पता, दवा, सज़ा, हवा, वफ़ा  |  Radeef: क्या
ये ज़िंदगी है क्या, इसका किसी को क्या पता? कभी खुशी है ये, कभी गम की है दवा। हर साँस में छुपी है, एक नई सी सज़ा, ये वक्त का दरिया है, बहता चला गया। क्या ढूँढता है बंदे, इस जहाँ में तू, जो साथ छोड़ जाए, ऐसी है ये हवा। हर मोड़ पर मिलती है, एक नई कहानी, किस बात की है हसरत, किस बात की वफ़ा। ये ज़िंदगी का मेला, है एक अजीब तमाशा, कौन अपना है यहाँ, कौन बेगाना, क्या पता?

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: किनारा, सहारा, नज़ारा, इशारा, प्यारा, गवारा, सारा, सँवारा  |  Radeef: है
ये ज़िंदगी का दरिया, जिसका न कोई किनारा है। हर भँवर में डूबने को, एक नया सहारा है। कभी धूप है, कभी छाँव, ये कैसा नज़ारा है, हर पल बदलता रंग, इसका यही इशारा है। जो चला गया सो गया, जो रहा वो हमारा है, इस भीड़ भरी दुनिया में, कौन किसको प्यारा है। गम को भी हँस के सहना, अब हमें गवारा है, क्योंकि हर दर्द के पीछे, छिपा कोई नज़ारा है। फुरकान! ये ज़िंदगी तो, बस एक खेल सारा है, जिसने समझा इसे, उसने ही खुद को सँवारा है।