Key Highlights

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) ने 2019 में काजीरंगा वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा पर अहम सिफारिशें की थीं।
  • इन सिफारिशों पर चार साल बीत जाने के बाद भी असम सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी है।
  • गलियारों की निष्क्रियता से काजीरंगा के वन्यजीवों, विशेषकर बाघों और हाथियों, के लिए खतरा लगातार बना हुआ है।

चार साल बाद भी निष्क्रिय असम, काजीरंगा के वन्यजीवों पर गहराता संकट

भारत के प्रतिष्ठित काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित करने की दिशा में असम सरकार की निष्क्रियता एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) ने 2019 में इन महत्वपूर्ण गलियारों को बचाने के लिए विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत की थीं। चार साल बीत चुके हैं। राज्य सरकार की ओर से उन पर कोई ठोस प्रगति नहीं दिख रही। यह स्थिति काजीरंगा के समृद्ध वन्यजीवों, जिनमें एक-सींग वाले गैंडे, बाघ और हाथी शामिल हैं, के लिए लगातार खतरा पैदा कर रही है।

विशेषज्ञ और संरक्षणवादी लंबे समय से इन गलियारों के महत्व पर जोर देते रहे हैं। ये गलियारे सिर्फ मार्ग नहीं, बल्कि बाढ़ के दौरान जानवरों को सुरक्षित ऊंचाई वाले स्थानों तक पहुंचने में मदद करते हैं। इनका अवरुद्ध होना वन्यजीवों के लिए मौत का फंदा साबित हो सकता है। वन्यजीवों को अकसर राष्ट्रीय राजमार्ग 37 पार करना पड़ता है। यह मार्ग इन गलियारों के बीच से गुजरता है।

सर्वोच्च न्यायालय की अहम सिफारिशें: क्या हुआ उन पर?

CEC की रिपोर्ट बेहद स्पष्ट थी। उसने नेशनल हाईवे 37 के आसपास और गलियारों के भीतर सभी प्रकार के अतिक्रमणों को हटाने की सिफारिश की थी। समिति ने कहा था कि गलियारों को अवैध निर्माण और मानव हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए। रिपोर्ट में वन्यजीवों के सुरक्षित मार्ग के लिए विशेष रूप से एलिवेटेड कॉरिडोर या अंडरपास बनाने का सुझाव भी दिया गया था। उद्देश्य था कि जानवर बिना किसी बाधा के सुरक्षित रूप से आवागमन कर सकें।

इन सिफारिशों को वन्यजीव संरक्षण के लिए एक मील का पत्थर माना गया था। इनकी अनदेखी से सवाल उठते हैं। क्या सरकार वन्यजीव संरक्षण के प्रति गंभीर है? कानूनी निर्देशों का पालन न करना चिंताजनक है। वन्यजीवों की सुरक्षा एक संवैधानिक कर्तव्य है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं ये गलियारे? वन्यजीवों का जीवन रेखा

काजीरंगा में रहने वाले विशालकाय जीव, विशेषकर हाथी और गैंडे, अक्सर भोजन और सुरक्षित आश्रय की तलाश में पड़ोसी कार्बी आंगलोंग पहाड़ियों की ओर पलायन करते हैं। यह प्रवृत्ति मानसून के दौरान और भी बढ़ जाती है, जब राष्ट्रीय उद्यान का निचला इलाका बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इन गलियारों के माध्यम से ही वे सुरक्षित स्थानों तक पहुंच पाते हैं। गलियारे उनके अस्तित्व के लिए एक जीवन रेखा हैं। प्राकृतिक आवासों का जुड़ा रहना प्रजातियों की विविधता और आनुवंशिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

इन गलियारों का अतिक्रमण या अवरुद्ध होना सीधे तौर पर जानवरों को मानव बस्तियों की ओर धकेलता है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दुर्घटनाएं होती हैं। कई बार दुर्भाग्यपूर्ण मौतें भी होती हैं। सड़क दुर्घटनाएं आम हो जाती हैं।

जानवरों पर गहराता संकट और भविष्य की चुनौतियां

असम के अधिकारियों की ओर से कार्रवाई में देरी का मतलब है कि काजीरंगा के जीव लगातार खतरे में हैं। गलियारों पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण जारी हैं। यह सीधे तौर पर CEC की सिफारिशों का उल्लंघन है। वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पैटर्न बाधित हो रहे हैं। उनकी आबादी पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। संरक्षणवादियों का कहना है कि हर बीतता दिन वन्यजीवों के लिए जोखिम बढ़ाता है।

राज्य सरकार को अब समय गंवाए बिना कार्रवाई करनी होगी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। वन्यजीव संरक्षण सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि कानूनी अनिवार्यता भी है। काजीरंगा वैश्विक धरोहर है। इसकी रक्षा करना देश की जिम्मेदारी है।

असम सरकार पर बढ़ता दबाव: अब कार्रवाई का समय

पर्यावरण कार्यकर्ता और संगठन लगातार असम सरकार पर दबाव बना रहे हैं। वे CEC की रिपोर्ट पर तुरंत कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इस मुद्दे पर जनता की राय भी महत्वपूर्ण है। एक विश्व प्रसिद्ध वन्यजीव स्थल की सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। गलियारों को सुरक्षित करना होगा। अवैध निर्माणों को रोकना होगा। वन्यजीवों को उनका अधिकार देना होगा। यह सिर्फ जानवरों के लिए नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

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