गम का साया: उदासी और निराशा पर एक मार्मिक ग़ज़ल

फ़ुरकान एस खान द्वारा रचित 'गम का साया' एक हृदयस्पर्शी ग़ज़ल है जो उदासी, निराशा और जीवन के बोझिल अनुभवों को बयां करती है। इस कविता में गहरे भावनात्मक दर्द को 'क्या करें' के रदीफ़ और मार्मिक काफ़िया के साथ खूबसूरती से उकेरा गया है।

Saturday, September 5, 2026
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गम का साया: उदासी और निराशा पर एक मार्मिक ग़ज़ल
“गम का साया: उदासी और निराशा पर एक मार्मिक ग़ज़ल”
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05 September 2026
गम का साया: उदासी और निराशा पर एक मार्मिक ग़ज़ल
Ghazal
जब दिल ही उदास हो, तो खुशियाँ कहाँ से लाएँ, क्या करें। हर तरफ़ गम का साया है, अब कहाँ जाएँ, क्या करें। आँखों में अश्क भर आएँ, कोई राहत न पाएँ, क्या करें। जब हर मोड़ पर ठोकर हो, तो मंज़िल को पाएँ, क्या करें। चेहरे पर झूठी हँसी है, ये दर्द किसे दिखाएँ, क्या करें। जब अंदर से टूट चुके हों, तो खुद को मिटाएँ, क्या करें। हर रात लंबी लगे है, सुबह की आस भी अब कहाँ से लाएँ, क्या करें। इस उदासी के आलम में, खुद को कैसे बहलाएँ, क्या करें।
Kaafiya लाएँ, जाएँ, पाएँ, दिखाएँ, मिटाएँ, बहलाएँ Radeef क्या करें
F Poetry ByFurkan S Khan
Ghazal
जो दिल में छुपा है गम, वो अब ज़ाहिर सही, कुछ और नहीं। इस उदासी का आलम, अब तो बस यही, कुछ और नहीं। आँखों में नमी है लेकिन, इसकी वजह कहीं, कुछ और नहीं। ये कैसा दर्द है या रब, जो मिटता कभी, कुछ और नहीं। हर आहट पर दिल डरता है, कोई अपना नहीं, कुछ और नहीं। इस भीड़ में भी तन्हाई है, ये एहसास तभी, कुछ और नहीं। ख्वाबों के शीशे टूटे, उम्मीदों का नामो-निशाँ भी नहीं, कुछ और नहीं। अब क्या बचा है जीने को, जब साथ कोई भी नहीं, कुछ और नहीं।
Kaafiya सही, यही, कहीं, कभी, नहीं, तभी Radeef कुछ और नहीं
F Poetry ByFurkan S Khan

यह ग़ज़ल उदासी और निराशा के गहरे भावों को व्यक्त करती है। 'लाएँ', 'जाएँ', 'पाएँ', 'दिखाएँ', 'मिटाएँ', 'बहलाएँ' जैसे काफ़िया 'क्या करें' रदीफ़ के साथ मिलकर एक मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। इसमें कवि यह पूछता है कि जब दिल ही उदास हो, हर तरफ़ गम का साया हो, आँखों में आँसू हों, कोई राहत न हो, और हर मोड़ पर ठोकर लगे, तो ऐसे में खुशियाँ कहाँ से लाएँ, कहाँ जाएँ, क्या करें। यह जीवन के बोझिल और दर्दनाक पहलुओं को दर्शाता है, जहाँ झूठी हँसी के पीछे दर्द छिपा है और खुद को मिटाने की इच्छा तक जागृत हो जाती है।

यह ग़ज़ल गहरे अकेलेपन और अनकहे दर्द को दर्शाती है। 'सही', 'यही', 'कहीं', 'कभी', 'नहीं', 'तभी' जैसे काफ़िया 'कुछ और नहीं' रदीफ़ के साथ मिलकर एक मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। कवि पूछता है कि दिल में छुपा गम अब केवल ज़ाहिर ही सही है, और उदासी का आलम भी बस यही है। आँखों में नमी है पर वजह कहीं नहीं मिलती, और यह दर्द कभी मिटता नहीं। भीड़ में भी तन्हाई का एहसास होता है, और जब उम्मीदें टूट चुकी हों, तो जीने के लिए कुछ और नहीं बचता।

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Zainab Khatoon
लेखक

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