यह ग़ज़ल उदासी और निराशा के गहरे भावों को व्यक्त करती है। 'लाएँ', 'जाएँ', 'पाएँ', 'दिखाएँ', 'मिटाएँ', 'बहलाएँ' जैसे काफ़िया 'क्या करें' रदीफ़ के साथ मिलकर एक मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। इसमें कवि यह पूछता है कि जब दिल ही उदास हो, हर तरफ़ गम का साया हो, आँखों में आँसू हों, कोई राहत न हो, और हर मोड़ पर ठोकर लगे, तो ऐसे में खुशियाँ कहाँ से लाएँ, कहाँ जाएँ, क्या करें। यह जीवन के बोझिल और दर्दनाक पहलुओं को दर्शाता है, जहाँ झूठी हँसी के पीछे दर्द छिपा है और खुद को मिटाने की इच्छा तक जागृत हो जाती है।
यह ग़ज़ल गहरे अकेलेपन और अनकहे दर्द को दर्शाती है। 'सही', 'यही', 'कहीं', 'कभी', 'नहीं', 'तभी' जैसे काफ़िया 'कुछ और नहीं' रदीफ़ के साथ मिलकर एक मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। कवि पूछता है कि दिल में छुपा गम अब केवल ज़ाहिर ही सही है, और उदासी का आलम भी बस यही है। आँखों में नमी है पर वजह कहीं नहीं मिलती, और यह दर्द कभी मिटता नहीं। भीड़ में भी तन्हाई का एहसास होता है, और जब उम्मीदें टूट चुकी हों, तो जीने के लिए कुछ और नहीं बचता।