दर्द की दास्तान
ग़ज़ल By फ़ुरकान एस खान
Kaafiya: नमी, गमी, कमी, ज़मी
Radeef: नहीं
दिल में अब कोई खुशी की किरन बाकी रही नहीं।
आँखों में अश्कों की अब कोई कमी नहीं।
जो साथ थे कभी, वो राहों में दिखे नहीं।
तन्हाई के आलम में कोई हमी नहीं।
उम्मीद की किरण कहीं अब दिखती नहीं।
हर साँस में बस एक पुरानी गमी नहीं।
ज़िंदगी की ज़मीन पर फूल खिलते नहीं।
बंजर हुई है सब, कोई नमी नहीं।
आँखों में अश्कों की अब कोई कमी नहीं।
जो साथ थे कभी, वो राहों में दिखे नहीं।
तन्हाई के आलम में कोई हमी नहीं।
उम्मीद की किरण कहीं अब दिखती नहीं।
हर साँस में बस एक पुरानी गमी नहीं।
ज़िंदगी की ज़मीन पर फूल खिलते नहीं।
बंजर हुई है सब, कोई नमी नहीं।
ग़ज़ल By फ़ुरकान एस खान
Kaafiya: कब, तलब, शब, अजब, सब
Radeef: अब
दिल को मेरे चैन मिले, ऐसा सोचा था कब।
पर ये दर्द है कि बढ़ता ही गया है अब।
जो साथ का वादा था, वो पूरा हुआ न कब।
हर रात है तन्हा, हर दिन है उदास अब।
किसी से शिकायत भी करूँ तो किससे करूँ अब।
हर बात है मेरी, मेरे लिए ही अजब।
ये कैसी है ज़िंदगी, ये कैसा है मेरा सब।
आँखों में आँसू हैं, होठों पे खामोशी है अब।
पर ये दर्द है कि बढ़ता ही गया है अब।
जो साथ का वादा था, वो पूरा हुआ न कब।
हर रात है तन्हा, हर दिन है उदास अब।
किसी से शिकायत भी करूँ तो किससे करूँ अब।
हर बात है मेरी, मेरे लिए ही अजब।
ये कैसी है ज़िंदगी, ये कैसा है मेरा सब।
आँखों में आँसू हैं, होठों पे खामोशी है अब।
ग़ज़ल By फ़ुरकान एस खान
Kaafiya: हुआ, गया, जुदा, सजा, दुआ
Radeef: क्या
मेरे दिल में था जो ख्वाब, वो पूरा हुआ क्या।
हर बार बस दर्द मिला, और कुछ भी न हुआ क्या।
जो अपना था कभी, वो हमसे जुदा हो गया क्या।
इस राह-ए-मोहब्बत की यही है सजा क्या।
किसी से उम्मीद रखना भी गुनाह है क्या।
जब हर दुआ में बस गम ही मिला क्या।
ये ज़िंदगी की राहें, ये मंज़िलें क्या।
हर कदम पर बस ठोकर मिली, और कुछ भी न मिला क्या।
हर बार बस दर्द मिला, और कुछ भी न हुआ क्या।
जो अपना था कभी, वो हमसे जुदा हो गया क्या।
इस राह-ए-मोहब्बत की यही है सजा क्या।
किसी से उम्मीद रखना भी गुनाह है क्या।
जब हर दुआ में बस गम ही मिला क्या।
ये ज़िंदगी की राहें, ये मंज़िलें क्या।
हर कदम पर बस ठोकर मिली, और कुछ भी न मिला क्या।