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ईर्ष्या की अग्नि: एक आंतरिक ज़हर | हिन्दी कविता

ईर्ष्या के विनाशकारी प्रभावों पर एक मार्मिक हिन्दी कविता। जानें कैसे यह भावना मन को जलाती है और रिश्तों को कड़वा बनाती है, शांति छीनकर बेचैनी देती है।

Thursday, September 24, 2026
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ईर्ष्या की अग्नि: एक आंतरिक ज़हर | हिन्दी कविता
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24 September 2026
ईर्ष्या की अग्नि: एक आंतरिक ज़हर | हिन्दी कविता
लघु कविता
ईर्ष्या एक आग है, जो भीतर ही जलती है। दूसरों की खुशी देख, अपनी आत्मा गलती है। यह है मन का, जो मीठे रिश्ते कड़वाए। हर सफलता को देख, मन में भड़काए। शांत सरोवर में भी, ये लहरें उठा जाती है। सुकून छीनकर, बस बेचैनी दे जाती है।
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Kaafiya जलती, गलती, कड़वाए, भड़काए, जाती, दे जाती
F Poetry ByFurkan S Khan
लघु कविता
पराई चमक पर, क्यों अपनी आँखें मूंदते हो? ईर्ष्या की में, खुद को क्यों झोंकते हो? जो तेरा नहीं, उस पर क्यों मन तड़पता है? यह तो अपना ही सुख, हाथों से फिसलता है। दूसरों की उड़ान देख, क्यों पंख अपने काटते हो? इस से, क्यों हर पल खुद को बाँटते हो?
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Kaafiya मूंदते, झोंकते, तड़पता, फिसलता, काटते, बाँटते
F Poetry ByFurkan S Khan

यह कविता ईर्ष्या के विनाशकारी स्वरूप का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें बताया गया है कि ईर्ष्या कैसे एक आंतरिक अग्नि की तरह मनुष्य को भीतर ही भीतर जलाती रहती है। जब कोई व्यक्ति दूसरों की सफलता या खुशी को देखकर प्रसन्न होने के बजाय ईर्ष्या से भर जाता है, तो यह उसके मन में एक ज़हर घोल देती है, जिससे मधुर संबंध भी कड़वे हो जाते हैं। कविता इस भावना को मन का 'विष' और 'अग्नि' बताती है, जो शांत मन में भी अशांति की लहरें उठा देती है। यह शांति और सुकून छीनकर केवल बेचैनी और असंतोष प्रदान करती है। इस कविता का उद्देश्य पाठक को ईर्ष्या के नकारात्मक प्रभावों से अवगत कराना और उन्हें इस विनाशकारी भावना से मुक्ति पाने की प्रेरणा देना है, ताकि वे दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ सकें और एक शांत व संतुष्ट जीवन जी सकें। यह आत्म-चिंतन और सकारात्मकता की ओर बढ़ने का एक आह्वान है।

यह कविता ईर्ष्या के आत्मघाती स्वरूप पर प्रकाश डालती है, जो व्यक्ति को दूसरों की सफलता से जलने के बजाय अपने ही सुख को नष्ट करने के लिए प्रेरित करती है। कवि प्रश्न करता है कि क्यों हम दूसरों की चमक से प्रभावित होकर अपनी आँखों को बंद कर लेते हैं और ईर्ष्या की आग में खुद को झोंक देते हैं। यह भावना उस चीज़ पर मन को तड़पाती है जो हमारी नहीं है, और इस प्रक्रिया में हम अपने पास मौजूद सुख को भी खो देते हैं। कविता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि दूसरों की उड़ान को देखकर अपने ही पंख क्यों काटे जाएँ। ईर्ष्या एक ऐसा 'संताप' या पीड़ा है जो हमें हर पल अंदर से खोखला करती रहती है, हमें अपने ही आनंद से वंचित करती है। यह कविता हमें यह संदेश देती है कि हमें अपनी तुलना दूसरों से करने के बजाय अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और दूसरों की सफलता से प्रेरणा लेनी चाहिए, न कि ईर्ष्या करनी चाहिए।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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