दर्द का शहर: Furkan S Khan की क़ितात

Furkan S Khan द्वारा रचित 'कसक ज़िंदाँ की' क़ितात, जो दर्द की गहराई और अकेलेपन की भावनाओं को व्यक्त करती है।

Monday, September 21, 2026
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दर्द का शहर: Furkan S Khan की क़ितात
“दर्द का शहर: Furkan S Khan की क़ितात”
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Date
21 September 2026
दर्द का शहर: Furkan S Khan की क़ितात
क़ितात
दर्द का एक शहर, जहाँ ख़ामोशी ज़ुबाँ है, क़ैद साँसों की हर आह, इक चीख़-ए-निहाँ है राहें ख़्वाबों की जैसे, सब वीरान हैं, हर उम्मीद का सूरज, जैसे डूबता हुआ है सीने में एक शो'ला है, जो सुलगता है, ये कैसा इम्तिहाँ है, जो गुज़रता हुआ है
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Kaafiya ज़िंदाँ, वीरान, सुलगता Radeef है
F Poetry ByFurkan S Khan

निहाँ: छिपा हुआ, गुप्त। वीरान: सूना, उजाड़। शो'ला: आग की लपट, ज्वाला। सुलगता: धीरे-धीरे जलना, भड़कना। इम्तिहाँ: परीक्षा, कसौटी।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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