क्रोध की अग्नि: रिश्तों को जलाती एक ज्वाला | Qit'a

इस Qit'a में क्रोध की विनाशकारी प्रकृति और रिश्तों पर उसके प्रभाव को दर्शाया गया है। जानें कैसे क्रोध शांति को भंग करता है और इसे प्रेम व क्षमा से कैसे बुझाया जा सकता है।

Saturday, September 19, 2026
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क्रोध की अग्नि: रिश्तों को जलाती एक ज्वाला | Qit'a
“क्रोध की अग्नि: रिश्तों को जलाती एक ज्वाला | Qit'a”
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19 September 2026
क्रोध की अग्नि: रिश्तों को जलाती एक ज्वाला | Qit'a
Qit'a
जब मन में उठता है एक छोटा सा शोला, ये आग हर रिश्ते को पल में जलाती है। शांत सरोवर में जैसे पत्थर कोई फेंके, हर लहर में बस अशांति बढ़ाती है। ये क्रोध की ज्वाला है, सब कुछ भस्म करती, अपनों के दिल में भी ज़हर घोल जाती है। हँसते हुए चेहरों से मुस्कान छीन लेती, पीछे बस तन्हाई का बोझ छोड़ जाती है। न कोई सुकून, न कोई राहत है इसमें, बस मन के अँधेरे को और गहरा बनाती है। क्या पाया तूने इस क्षणिक आवेश से बोलो, बस खोया ही सब कुछ, ये बात सता जाती है। अब छोड़ दे ये ज़िद, ये आग बुझा दे, प्रेम और क्षमा से हर ज़ख्म भर जाती है। शांति की राह चुनो, जीवन को संवारो, क्रोध का दामन छोड़ खुशियाँ लौट आती है।
Kaafiya जलाती, बढ़ाती, जाती, बनाती, सताती, आती Radeef है
F Poetry ByFurkan S Khan
Qit'a
भीतर ही भीतर एक आग सी जलता है, जब क्रोध की लपटों में इंसान बदलता है। शांत स्वभाव भी पल भर में खो जाता, हर शब्द तीखे तीर सा चलता है। ये ज़हर है जो रग-रग में उतर जाता है, अपना ही सुकून पल भर में मल जाता है। क्या पाया सिवा इसके बेताबी और घुटन, मन का हर कोना अँधेरे में ढल जाता है। जब होश आता है, बस पछतावा रह जाए, टूटे हुए रिश्तों का बोझ बढ़ जाता है। वो बातें जो कही थीं, वो घाव जो दिए थे, हर याद में दिल फिर से सुलग जाता है। मिटा दे ये ज़हर, ये गुस्सा मिटा दे, प्रेम की वर्षा से हर दाग धुल जाता है। जीवन को नए रंगों से फिर से संवारो, क्रोध का साया ढले तो मन खिल जाता है।
Kaafiya जलता, बदलता, चलता, मलता, जाता, बढ़ता, सुलगता, धुलता, खिलता Radeef है
F Poetry ByFurkan S Khan

शोला: चिंगारी, छोटी आग भस्म करती: राख कर देती है, नष्ट कर देती है क्षणिक आवेश: पल भर का गुस्सा दामन छोड़: त्याग देना, छोड़ देना

लपटों: ज्वाला, आग की लपटें मल जाता है: नष्ट हो जाता है, खराब हो जाता है बेताबी: बेचैनी, अधीरता घुटन: दम घुटने जैसा महसूस होना, घुटन सुलग जाता है: फिर से जल उठता है, टीस उठती है साया ढले: प्रभाव कम हो, अँधेरा हटे

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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