विस्मय के रंग: फ़ुरकान एस ख़ान की आध्यात्मिक सूफी कविता

फ़ुरकान एस ख़ान द्वारा रचित 'विस्मय के रंग' एक मार्मिक सूफी कविता है जो ब्रह्मांड के हर कण में ईश्वर की अद्भुत उपस्थिति और रहस्यमय सुंदरता को दर्शाती है।

Sunday, September 20, 2026
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विस्मय के रंग: फ़ुरकान एस ख़ान की आध्यात्मिक सूफी कविता
“विस्मय के रंग: फ़ुरकान एस ख़ान की आध्यात्मिक सूफी कविता”
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20 September 2026
विस्मय के रंग: फ़ुरकान एस ख़ान की आध्यात्मिक सूफी कविता
Sufi Poetry
हर ज़र्रे में है एक कहानी, क्या खूब नज़ारा है! हर साँस में है एक रवानी, क्या खूब नज़ारा है! ये पेड़, ये पर्वत, ये नदियाँ गहरी, हर रंग में तेरी ही सूरत ठहरी। कभी रात की खामोशी, कभी सुबह की लाली, हर पल में है एक अद्भुत खुशाली। ये फूलों का खिलना, ये भँवरों का गुँजना, तेरी ही कला का है, हर सूँ सजना। न कोई सीमा, न कोई अंत, हर ओर पसरा है, तेरा ही पंथ। आँखों में हैरत, दिल में सुकून गहरा, यह कैसा फ़साना, यह कैसा पहरा। मैं खोजता रहा तुझे, हर दिशा में भटकता, तू तो मेरे भीतर ही था, हर पल झलकता। यह विस्मय ही है मेरी इबादत, तेरी हर अदा में है, मेरी चाहत।
Kaafiya कहानी, रवानी, ठहरी, खुशाली, सजना, पंथ, पहरा, झलकता, चाहत
F Poetry ByFurkan S Khan
Sufi Poetry
जब से लगी है तेरी लगन, कुछ और न भाए। हर साँस में बस तेरा ही नाम, दिल दोहराए। यह कैसा नशा है, यह कैसा जुनून, तेरी याद में खोकर, मिलता है सुकून। ज़माना कहे पागल, दीवाना कहे, मैं तो तेरी गली का, हर रास्ता सहे। हर ज़र्रे में तेरा ही अक्स नज़र आए, हर फूल में तेरी ही खुशबू समाए। न कोई मंदिर, न कोई मस्जिद, मेरा दिल ही है तेरा आबाद। यह इश्क़-ए-हक़ीक़ी, यह रूह की पुकार, तू ही मेरा साक़ी, तू ही मेरा यार। कब तक छिपाओगे खुद को, पर्दों के पीछे, इक दिन तो मिलना ही है, हर राह के नीचे। मेरी हर दुआ में है, तेरी ही चाहत, तू ही मेरी मंज़िल, तू ही मेरी राहत।
Kaafiya भाए, दोहराए, जुनून, सुकून, सहे, समाए, आबाद, यार, नीचे, राहत
F Poetry ByFurkan S Khan

ज़र्रे: कण, छोटा हिस्सा रवानी: बहाव, गति सूरत: रूप, आकृति ठहरी: बसी हुई, स्थिर लाली: लालिमा, सुबह की रोशनी खुशाली: प्रसन्नता, खुशी भँवरों: भौरों का बहुवचन गुँजना: भौरों की आवाज़ सूँ: दिशा, तरफ़ पंथ: मार्ग, रास्ता हैरत: आश्चर्य, अचंभा सुकून: शांति, चैन फ़साना: कहानी, वृत्तांत पहरा: निगरानी, चौकसी भटकता: घूमता रहा, भटकता रहा झलकता: दिखाई देता रहा, प्रकट होता रहा इबादत: पूजा, उपासना अदा: अंदाज़, शैली चाहत: इच्छा, प्रेम

लगन: निष्ठा, लगाव भाए: पसंद आए, अच्छा लगे दोहराए: बार-बार कहे जुनून: गहरा प्रेम, धुन सुकून: शांति, चैन ज़माना: दुनिया पागल: उन्मत्त दीवाना: प्रेमी, मग्न गली: मार्ग, रास्ता सहे: सहन करे, बर्दाश्त करे अक्स: प्रतिबिंब, परछाई समाए: समाहित हो, बस जाए आबाद: बसा हुआ, फलता-फूलता (यहाँ आश्रय) इश्क़-ए-हक़ीक़ी: सच्चा प्रेम, ईश्वरीय प्रेम रूह: आत्मा पुकार: बुलावा, आवाज़ साक़ी: शराब पिलाने वाला (सूफी मत में ईश्वरीय प्रेम का प्रतीक) यार: मित्र, प्रियतम पर्दों: आवरण, परदे मंज़िल: लक्ष्य, गंतव्य राहत: आराम, शांति

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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