सालार मसूद ग़ाज़ी के नाम से लगने वाला जेठ मेला और बहराइच का हक़
सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी र. अ. के नाम से लगने वाला बहराइच का ऐतिहासिक जेठ मेला और उसका स्थानीय मिडिल क्लास के जीवन पर प्रभाव।
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बहराइच की सरज़मीन पर हर साल जेठ महीने में जो मेला सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी र. अ. के नाम से लगता है, वह सिर्फ एक मज़हबी ताज़गी नहीं, बल्कि वहाँ के मिडिल क्लास तबके का आर्थिक सहारा भी है। जब मुल्क की बड़ी सड़कों से बहराइच की गलियाँ गुलज़ार होती हैं, तब वहाँ के छोटे कारोबारी, दस्तकार, फेरीवाले और होटल वाले पूरे साल की रोज़ी एक महीने में बटोरते हैं।
यह मेला उनके लिए एक तिजारती तौहफा है, जो बड़े शहरों के साये में जीते हैं — लखनऊ, दिल्ली, मुंबई या सऊदी अरब के मेहनतकश मजदूर जो बहराइच का नाम अपने पसीने से ज़िंदा रखते हैं। जिले में न कोई बड़ी इंडस्ट्री है, न कोई सरकारी यूनिवर्सिटी, और न ही रोज़गार के पुख़्ता ज़रिये। ऐसे में यह मेला एक सालाना अमानत है, जिससे लोगों के चूल्हे जलते हैं।
"जिस मेले से किसी की रोज़ी रोटी जुड़ी हो, उसे बंद करना मज़हब की हिफाज़त नहीं, ज़ुल्म है — और हक़ के खिलाफ खामोशी, सबसे बड़ी बेइंसाफ़ी।"
- बहराइच की साक्षरता दर 50% से कम है।
- शहर में न कोई बड़ा कॉलेज है, न रोज़गार के मौके।
- मेले से हजारों लोगों को रोज़गार मिलता है।
- सरकार की बेरुख़ी ने इसे इकलौता ज़रिया बना दिया है।
यह कहना कि मेले में फुहड़ता है या यह गैर-शरीयत है, सिर्फ एक बहाना है। अगर आप चाहते हैं कि यह बंद हो, तो पहले कोई ऐसा इदारती और तालीमी निज़ाम लाओ, जिससे इस मेला-निर्भर तबके को और रास्ते मिल सकें। वरना यह सिर्फ डर है, दीन या ईमान का नहीं — बल्के खुद के इरादों का।
आज बाज़ारों की रौनकें हमारे घर की इज़्ज़तदार औरतें हैं, जो नक़ाबों में भी भीड़ बन चुकी हैं। यह सोचने की ज़रूरत है कि क्यों वह भी अब घर से बाहर कमाने को मजबूर हैं। मेला तो सिर्फ एक रास्ता है, जिसे बंद करना आसान है, पर उसका विकल्प देना जिम्मेदारी है।
"1000 साल से जो रवायत ज़िंदा है, उसे चंद अफ़सरों के फ़ैसले से मिटाया नहीं जा सकता। मेला चलता था, चलता रहेगा।"
- मेला बंद करने से पहले विकल्प पेश किया जाए।
- लोगों को विरोध का हक है — संविधान उन्हें इसकी इजाज़त देता है।
- कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना भी एक रास्ता है।
- मेले का बचना बहराइच के वजूद का बचना है।
Article By: Dr Faizul Hasan
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