ईरानी क्रांति: 1979 में अयातुल्लाह खुमैनी की वापसी और शाह का अंत
1 फरवरी 1979 को अयातुल्लाह खुमैनी की ईरान वापसी ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन के अंत और ईरानी क्रांति की जीत की मुहर लगा दी। शाह के 'व्हाइट रिवोल्यूशन' की असफलताओं और SAVAK के दमन ने जनता में भारी असंतोष पैदा किया। 14 साल के निर्वासन में खुमैनी ने कैसेट टेपों के ज़रिए क्रांति की लौ जलाई। शाह के पलायन के बाद, खुमैनी ने ईरान को एक इस्लामी गणराज्य घोषित किया, जिसने देश के इतिहास और राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
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1 फरवरी 1979 को, अयातुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी 14 साल के निर्वासन के बाद तेहरान लौटे। एयर फ़्रांस के उनके विमान ने जैसे ही ईरानी धरती को छुआ, लाखों लोगों की भीड़ ने उनका स्वागत किया। यह सिर्फ एक नेता की वापसी नहीं थी, बल्कि ईरानी क्रांति की ऐतिहासिक जीत का क्षण था, जिसने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन का अंत कर दिया।
शाह का 'व्हाइट रिवोल्यूशन' और असंतोष की जड़ें
1950 और 60 के दशक में, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने 'व्हाइट रिवोल्यूशन' (श्वेत क्रांति) की घोषणा की, जिसका उद्देश्य ईरान को आधुनिक बनाना था। इसमें महिलाओं को वोट का अधिकार, भूमि सुधार और शिक्षा व स्वास्थ्य पर जोर जैसे प्रगतिशील कदम शामिल थे। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन, ने शाह को अपना "आधुनिक पार्टनर" माना।
हालांकि, ये सुधार जमीनी स्तर पर असफल रहे। भूमि सुधारों से गरीबों को खास फायदा नहीं हुआ, और इस्लामी धर्मगुरुओं ने परंपराओं के उल्लंघन पर नाराजगी व्यक्त की। देश में अमीर और अमीर होते गए, जबकि आम लोग बेरोजगारी और गरीबी से जूझते रहे। शाह की खूंखार गुप्त पुलिस, SAVAK, ने किसी भी विरोध को बेरहमी से कुचल दिया, जिससे जनता का गुस्सा बढ़ता गया।
खुमैनी का उदय और क्रांति की लहर
अयातुल्लाह खुमैनी ने 1963 में शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर तुर्की और फिर इराक निर्वासित कर दिया गया। लेकिन निर्वासन में भी, खुमैनी चुप नहीं रहे। उनके भाषण और फतवे कैसेट टेपों के जरिए पूरे ईरान में फैल गए। मस्जिदों, दुकानों और घरों में ये टेप खुफिया रूप से सुने जाते थे। खुमैनी का संदेश स्पष्ट था: "शाह इस्लाम का दुश्मन है। यह पश्चिम का गुलाम है। इसको हटाना फर्ज है।"
1978 के अंत तक, पूरे ईरान में सड़कों पर विशाल प्रदर्शन होने लगे। "मर्ग बार शाह!" (शाह की मौत हो) के नारे गूंजने लगे। पुलिस की गोलियों और बढ़ती मौतों के बावजूद आंदोलन नहीं रुका। मजदूर, छात्र, व्यापारी और यहां तक कि सरकारी अधिकारी भी शाह के खिलाफ खड़े हो गए।
क्रांति की जीत: शाह का पलायन और इस्लामी गणतंत्र की स्थापना
अंततः, 16 जनवरी 1979 को, शाह देश छोड़कर भाग गए। यह ईरान के इतिहास में एक निर्णायक क्षण था।
1 फरवरी 1979 को, अयातुल्लाह खुमैनी की तेहरान वापसी हुई, जिसे लाखों लोगों ने एक त्योहार की तरह मनाया। जिस देश से उन्हें कभी निकाला गया था, उसी देश ने उन्हें अपना "रहबर" (नेता) स्वीकार किया। खुमैनी ने तुरंत एक अस्थायी प्रधानमंत्री नियुक्त किया, लेकिन वास्तविक शक्ति उनके हाथों में थी। पुराने अधिकारियों को बर्खास्त किया गया; कुछ को जेल हुई और कुछ को मौत की सजा दी गई।
30-31 मार्च को एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ईरानी जनता से पूछा गया कि "क्या आप इस्लामी गणराज्य चाहते हैं?" लगभग 98% लोगों ने "हां" में जवाब दिया। इस तरह, ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया, जो पश्चिमी सिद्धांतों से हटकर शिया इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित एक नया राजनीतिक निजाम था।
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