बंगाल में वामपंथ का पतन: 'पहले राम, फिर बाम' सिर्फ़ एक परिणाम था, कारण नहीं
बंगाल में वामपंथ के पतन का गहन विश्लेषण। 'पहले राम, फिर बाम' का नारा कैसे बदलते राजनीतिक परिदृश्य का परिणाम था, न कि मूल कारण।
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Key Highlights
- वामपंथ का पतन दशकों की राजनीतिक विफलता और जनाधार खोने का परिणाम था।
- 'पहले राम, फिर बाम' का नारा भाजपा के उभार को दर्शाता है, लेकिन यह वामपंथ के कमजोर होने के बाद आया।
- तृणमूल कांग्रेस ने शुरुआती शून्य भरा, बाद में भाजपा ने अपनी जगह बनाई।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक आम कहावत 'पहले राम, फिर बाम' अक्सर सुनाई देती है। यह कथन अक्सर वामपंथ के ऐतिहासिक पतन और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा करता है। हालांकि, गंभीर राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह नारा वामपंथ के विघटन का कारण नहीं, बल्कि एक गहरा परिणाम था। राज्य में वामपंथी मोर्चे का तीन दशकों से अधिक का शासन अपनी ही कमजोरियों के बोझ तले दब गया, जिससे एक राजनीतिक शून्य पैदा हुआ जिसे पहले तृणमूल कांग्रेस और फिर भाजपा ने भरा।
वामपंथ का सूरज दशकों तक बंगाल में चमकता रहा। 1977 से 2011 तक, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा ने राज्य पर राज किया। यह शासन गरीबों और मजदूरों के लिए न्याय की बात करता था। लेकिन धीरे-धीरे, पार्टी का जमीनी जुड़ाव कमजोर पड़ने लगा। किसानों और युवाओं से दूरी बढ़ती गई। नीतियों में कठोरता और लचीलेपन की कमी ने भी जनता को निराश किया। नंदीग्राम और सिंगूर जैसे भूमि अधिग्रहण के विवादास्पद मामले वाममोर्चा के पतन में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि पार्टी जनता की नब्ज़ समझने में नाकाम रही है।
खाली हुई जमीन और टीएमसी का उदय
जैसे ही वामपंथ का जनाधार खिसका, ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उस खाली जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया। टीएमसी ने आक्रामक तरीके से वामपंथी नीतियों का विरोध किया और खुद को बदलाव की ताकत के रूप में प्रस्तुत किया। 2011 में, ममता बनर्जी ने वाममोर्चे के 34 साल के शासन को समाप्त करते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की। यह वामपंथ के लिए एक बड़ा झटका था, जिसने उन्हें राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिया। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं थी। टीएमसी की जीत ने एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दिया, पर कुछ खास सामाजिक और वैचारिक वर्गों में एक खालीपन अभी भी बाकी था।
भाजपा की रणनीतिक चाल और 'राम' का प्रतीक
टीएमसी के सत्ता में आने के बाद भी, बंगाल में एक बड़ा वर्ग ऐसा था जो तृणमूल की राजनीति से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं था। यह वह खालीपन था जिसे भाजपा ने अपनी रणनीतिक चालों से भरना शुरू किया। भाजपा ने धीरे-धीरे राज्य में अपनी पैठ बनाई, खासकर उन ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में जहां वामपंथी कभी मजबूत थे। पार्टी ने अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा और 'राम' के सांस्कृतिक प्रतीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया। यह प्रतीकात्मकता उन लोगों के लिए एक नया विकल्प बनकर उभरी जो लंबे समय से वामपंथ के सेक्युलर विमर्श से थक चुके थे या फिर एक नई पहचान की तलाश में थे। वीर सावरकर के हिंदुत्व जैसी विचारधारा को एक नई पीढ़ी में भी प्रासंगिक माना गया, जिससे भाजपा को और बल मिला।
परिणाम, कारण नहीं
इसलिए, 'पहले राम, फिर बाम' यह दर्शाता है कि भाजपा का उदय वामपंथ के लंबे और जटिल पतन का एक स्वाभाविक परिणाम था। यह कोई बाहरी कारण नहीं था जिसने वामपंथ को कमजोर किया। बल्कि, यह उनकी अपनी आंतरिक कमजोरियां, जनता से अलगाव और बदलते समय के साथ अनुकूलन करने में विफलता थी जिसने भाजपा जैसी नई ताकतों के लिए रास्ता साफ किया। भाजपा ने उस खालीपन को पहचान लिया और उसे सफलतापूर्वक भरा, जिसे वामपंथ ने अपने हाथों से खो दिया था। बंगाल की राजनीतिक भूमि पर वामपंथ का सिकुड़ना, एक लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया का परिणाम था, जिसके बाद 'राम' का बोलबाला हुआ।
इस प्रकार, बंगाल की राजनीति में यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक गहरे सामाजिक-राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत था। वामपंथ के पतन ने एक ऐसा माहौल बनाया जिसमें 'राम' जैसी प्रतीकवादी राजनीति को जड़ें जमाने का अवसर मिला। यह एक परिणाम था, न कि शुरुआती कारण। बंगाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर पर अधिक विस्तृत कवरेज के लिए, Vews.in पर बने रहें।
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