जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मदरसों को बंद करने की NCPCR सिफारिश पर रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR की सिफारिश पर रोक लगाई, जिससे मदरसों को बंद करने का आदेश नहीं दिया गया। धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए यह महत्वपूर्ण निर्णय।
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हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की उस सिफारिश पर रोक लगा दी है जिसमें कहा गया था कि उन मदरसों को बंद किया जाए जो शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम का पालन नहीं कर रहे हैं। यह निर्णय जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा दायर एक याचिका पर सुनाया गया था, जिसमें यह दावा किया गया था कि यह सिफारिश धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करती है।
“सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है।” — वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंहयह बयान न्यायालय के आदेश के संदर्भ में है, जो मदरसों की मान्यता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
मदरसों के बंद होने की पृष्ठभूमि
यह मामला तब शुरू हुआ जब NCPCR ने 7 जून 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर उन मदरसों की मान्यता रद्द करने का निर्देश दिया जो RTE अधिनियम का पालन नहीं करते। इसके बाद 25 जून 2024 को आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए कि वे मदरसों की जांच करें और उन मदरसों की मान्यता रद्द करें जो RTE के मानदंडों को पूरा नहीं करते।
उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा के आदेश
- उत्तर प्रदेश के जिला कलेक्टर्स को 26 जून 2024 को निर्देश दिया गया कि वे सभी सरकारी सहायता प्राप्त/मान्यता प्राप्त मदरसों की विस्तृत जांच करें जो गैर-मुस्लिम बच्चों को स्वीकार करते हैं।
- आदेश में यह भी कहा गया कि सभी मदरसों में नामांकित बच्चों को स्कूलों में तुरंत प्रवेश दिलाना सुनिश्चित करें।
- त्रिपुरा सरकार ने भी 28 अगस्त 2024 को इसी तरह के निर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ द्वारा अंतरिम आदेश पारित किया। पीठ ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- “अगली आदेश तक, NCPCR के 7 जून और 26 जून 2024 के पत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा जारी 26 जून 2024 के पत्र पर कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।”
- याचिका में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार के रूप में शामिल करने की अनुमति दी गई।
संविधान के अनुच्छेद 30 का संदर्भ
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने संविधान के अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को शिक्षा देने का अधिकार है। यह अधिकार न केवल धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है, बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए उनके धार्मिक संस्थानों को संचालित करने का भी अधिकार प्रदान करता है।
धार्मिक मदरसों के विरुद्ध एनसीपीसीआर की गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
— Jamiat Ulama-i-Hind (@JamiatUlama_in) October 21, 2024
- जमीअत उलमा के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने निर्णय का स्वागत किया और कहा कि #NCPCR चेयरमैन ने आंखों पर पट्टी डाल रखी है
नई दिल्ली, 21 अक्टूबर। जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने सुप्रीम… pic.twitter.com/UEC323IpGs
NCPCR की सिफारिशों का प्रभाव
NCPCR की सिफारिशें, अगर लागू की जातीं, तो कई मदरसों के लिए अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर सकती थीं। मदरसों में हजारों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, और उनकी मान्यता रद्द होने से इन बच्चों का भविष्य अंधकार में चला जाता। यह केवल एक शिक्षा प्रणाली का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी मामला है।
संक्षेप में
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मदरसों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस फैसले से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसा शिक्षा का अधिकार भी संरक्षित रहे, जो कि भारतीय लोकतंत्र की विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है। अदालत का यह निर्णय न केवल बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि यह सामाजिक सामंजस्य और धार्मिक स्वतंत्रता को भी प्रोत्साहित करता है।
आगे की कार्यवाही में, सभी संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया जाएगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिक्षा का अधिकार सभी बच्चों के लिए सुलभ हो। इस तरह के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका अपनी भूमिका निभाते हुए संविधान के मूल सिद्धांतों की रक्षा कर रही है।
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