दिखावे की ज़िंदगी Artificially Maintained Status in our
कृत्रिम सामाजिक दर्जा एक ऐसा बोझ है जिसे इंसान खुद अपने कंधों पर डालता है — और फिर उसी के नीचे दबता चला जाता है।
Artificially Maintained Status in our society
ہمارے معاشرے میں مصنوعی طور پر قائم کیا گیا اسٹیٹس
हमारे समाज में कृत्रिम या बनावटी रूप से बनाए रखा गया दर्जा (स्टेटस)
भारतीय समाज में “status” या सामाजिक दर्जा हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। लेकिन अब यह सिर्फ जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति से ही नहीं जुड़ा बल्कि एक नया रूप ले चुका है: कृत्रिम रूप से बनाए गए सामाजिक दर्जे।
समाज में अपनी जगह, पहचान और इज़्ज़त को लेकर एक गहरी बेचैनी है। लोग अब यह सोचने लगे हैं कि “दूसरे क्या सोचेंगे” और यहीं से जन्म होता है एक नए किस्म के दबाव का, जिसे हम कह सकते हैं: “Artificially Maintained Status”।
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यहां लिखेंकृत्रिम सामाजिक दर्जा क्या है?
यह वह सामाजिक छवि है जो इंसान हकीकत में नहीं जीता, लेकिन दिखाने की कोशिश करता है कि वह उसी स्तर का है। यह दर्जा आमतौर पर दिखावे, झूठे दिखावों, और सामाजिक दबावों के चलते बनाया जाता है। इसमें व्यक्ति या परिवार अपनी आय, योग्यता या सामाजिक हैसियत से ज़्यादा कुछ दिखाने का प्रयास करता है चाहे इसके लिए उधार लेना पड़े, कर्ज़ में डूबना पड़े या खुद को मानसिक तनाव में डालना पड़े।
इस सोच की उत्पत्ति और मनोविज्ञान:
यह प्रवृत्ति post-colonial influence, जातीय पूर्वाग्रह, और समाज में बढ़ती comparison-based सोच से उपजी है। बहुत से परिवारों में “खानदानी रुतबा” का भ्रम इतना गहरा गया है कि वे character से ज़्यादा surname और profession पर ध्यान देते हैं।
यह प्रवृत्ति लगभग हर वर्ग में देखी जा सकती है:
मिडिल क्लास शादी-विवाह:
आमदनी सीमित है, लेकिन शादी में लाखों खर्च किए जाते हैं ताकि समाज कहे, “क्या शानदार आयोजन था।” इसके लिए लोग अक्सर कर्ज़ ले लेते हैं।
सोशल मीडिया लाइफस्टाइल
युवा वर्ग इंस्टाग्राम Facebook पर ऐसी ज़िंदगी दिखाता है जो शायद असल में है ही नहीं ,ब्रांडेड कपड़े, महंगे कैफे, फैंसी ट्रैवल ज़्यादातर उधार या कर्ज़ की देन है।
बच्चों की शिक्षा और स्कूलिंग
सिर्फ “नाम” के लिए बड़े-बड़े निजी स्कूलों में बच्चों को डाल दिया जाता है, भले ही फीस भरना मुश्किल हो और बच्चों की ज़रूरतें कहीं और हों।
यह एक ऐसा चलन है जिसमें लोग अपनी असल हैसियत, मूल्यों, रिश्तों और ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ कर, केवल बाहरी दिखावे और झूठे मानदंडों के आधार पर इज़्ज़त और ओहदे का भ्रम बनाए रखते हैं।
ये दर्जा असली नहीं होता पर इसका बोझ असली है।
आज के भारत में कई परिवार ऐसे हैं जो दूसरों की नज़रों में ‘सम्मानजनक’ दिखने के लिए कर्ज़ में डूब जाते हैं। सोशल मीडिया पर “लाइफस्टाइल” दिखाने की होड़ में असली ज़िंदगी की ज़रूरतें पीछे छूट जाती हैं। शादी-ब्याह, त्योहार, बच्चों की पढ़ाई , सब कुछ अब एक शो बन चुका है। मकसद होता है दूसरों को दिखाना कि हम भी “कुछ हैं”। पर इसका समाज पर क्या असर है?
आर्थिक दबाव:
लोग अपनी कमाई से ज़्यादा खर्च करने लगते हैं। EMI, कर्ज़, लोन ,यह एक चक्रव्यूह बन जाता है।
मानसिक तनाव:
हर वक्त खुद को बेहतर दिखाने की होड़ में इंसान खुद से दूर होता जाता है। hypertension , आत्महत्या जैसे मामले बढ़ते हैं।
सामाजिक असमानता:
ये कृत्रिम दर्जा एक झूठी तुलना को जन्म देता है, जिससे असल ज़रूरतें दब जाती हैं
निष्कर्ष
कृत्रिम सामाजिक दर्जा एक ऐसा बोझ है जिसे इंसान खुद अपने कंधों पर डालता है — और फिर उसी के नीचे दबता चला जाता है। अगर हम एक स्वस्थ, ईमानदार और बराबरी पर आधारित समाज चाहते हैं, तो हमें इस दिखावे की संस्कृति को चुनौती देनी होगी। असली इज़्ज़त वही है जो सच्चाई पर खड़ी हो — न कि उस नकली चमक पर, जो सिर्फ दूसरों को दिखाने के लिए जलाई जाती है।
Dr. Faizul Hasan Official | Verified Expert • 30 May, 2025 मुख्य संपादक
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पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी