इंसानियत पर वार: ग़ज़ा में दो दिन, 300 लाशें - और हमारी ख़ामोशी

इज़राइली हवाई हमलों ने ग़ज़ा में 48 घंटों में 300 से अधिक फ़िलिस्तीनियों की जान ली। 53,000 से अधिक मृत्यु और अस्पताल संकट के बीच, लेख मानवाधिकार, मीडिया कवरेज, और नैतिक ज़िम्मेदारी पर सवाल उठाता है।

Dr. Faizul Hasan
Dr. Faizul Hasan Official | Verified Expert • 30 May, 2025 मुख्य संपादक
मई 18, 2025 • 2:10 AM | फिलिस्तीन  35  0
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इंसानियत पर वार: ग़ज़ा में दो दिन, 300 लाशें - और हमारी ख़ामोशी
ग़ज़ा में दो दिन, 300 लाशें

पिछले 48 घंटों में इज़राइली वायुसैनिकों की बमबारी ने ग़ज़ा में तीन सौ से अधिक फ़िलिस्तीनियों की जान ले ली। यह आँकड़ा महज़ cold statistic नहीं यह 300 अधूरी कहानियाँ, 300 उजड़ते परिवार, और 300 बार हमारी सामूहिक संवेदना की परीक्षा है। 

1. मौत की रफ़्तार से तेज़ ख़बरों की रफ़्तार हमने स्क्रीन पर “Operation Gideon’s Chariots” जैसे युद्धोन्माद भरे शीर्षक देखे, पर दूसरी ओर एक सामान्य-सी पंक्ति में दर्ज था: “तीन दिन में 300 मौतें।” - इतना पढ़ते-पढ़ते हम आगे स्क्रोल कर जाते हैं, मानो यह कोई दूर के ग्रह का सूखा आँकड़ा हो। मीडिया-मंथन का यही अपराध है: इंसानी त्रासदी को “न्यूज़-साइज़” में काट-छाँट कर परोस देना।

2. आँकड़े बनाम अफ़साने ग़ज़ा का कुल

❤️ खास आप के लिए

मृत्यु-संपुट अब 53,000 पार कर चुका है; क़रीब 60 हज़ार घायलों के लिए अस्पतालों में न दवा है न बिजली। इंडोनेशियन हॉस्पिटल जैसा एक-एक केंद्र मलबे-तले दबे लोगों को हाथ से खुदाई कर निकाल रहा है। एक दिन में 140 लाशें आईँ, शवगृह ठसाठस भरे, तो नर्सों ने बर्फ़ के डिब्बों में बच्चों के शव रखे। यही वह यथार्थ है, जो अक्सर ‘कवरेज-काबिल’ नहीं समझा जाता। 

3. अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक रंगमंच

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युद्धविराम वार्ताएँ क़तर में फिर बिछीं; जर्मनी ने “मानवीय सरोकार” जताया, अरब लीग ने 40 मिलियन डॉलर की पुनर्निर्माण सहायता का वादा किया—पर जमीनी हकीकत में बम अब भी गिर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का “ग़ज़ा को फ़्रीडम ज़ोन” बनाने का प्रस्ताव कूटनीतिक शिगूफ़ा बन कर रह गया। जिन बच्चों को आज दफ़नाया जा रहा है, उनके लिए ये घोषणाएँ महज़ शब्द हैं। 

4. हमारी नैतिक दूरी

हम भारत में किसी एक सड़क हादसे पर शोकसंदेशों की बाढ़ बहा देते हैं—और यह स्वाभाविक भी है। लेकिन यदि दो दिन में 300 मासूम मर जाएँ और हम “कमेंट सेक्शन” में भी चुप रहें, तो यह चुप्पी खुद में एक बयान है। इंटरनेट-युग में दूरी बहाना नहीं; ग़ज़ा की तस्वीरें हमारी हथेली पर हैं। सवाल यह है कि हम उन तस्वीरों को देखने के बाद क्या करते हैं? 

5. क्या किया जा सकता है?

A. सूचना का पुनर्वितरण 

 विश्वसनीय स्रोतों से अपडेट शेयर करें; युद्ध-भाषा का पर्दाफ़ाश करें।

B. राजनीतिक दबाव

अपने जनप्रतिनिधियों को लिखें; भारत-इज़राइल रक्षा समझौते में मानवाधिकार की शर्तें जोड़ने की माँग करें। 

C. इंसानी मदद 

विश्वसनीय राहत संगठनों (जैसे UNRWA, इंडियन हेल्पिंग हैंड्स) को दान दें, जिन्हें अभी भोजन-किट, मेडिकल सप्लाई पहुँचानी है। 

D. अकादमिक व सांस्कृतिक बहिष्कार

विश्वविद्यालय, फ़िल्म फ़ेस्टिवल, या स्पोर्ट्स इवेंट में नागरिक-हत्याओं पर स्पष्ट स्टैंड की माँग करें। 

6. लेखनी बनाम ख़ामोशी

एडवर्ड सईद ने लिखा था, “बम गिरते समय साहित्य मुर्दा नहीं रहता, वह या तो प्रतिरोध है या अपराध-सहभगिता।” अगर हम कलम (या कीबोर्ड) नहीं उठाते, तो ख़ामोशी खुद एक पक्ष बन जाती है हमारी अनिच्छा शोषण तंत्र को वैधता देती है। ग़ज़ा में गिरता हर बम हमें याद दिला रहा है कि इंसानियत की अंत्येष्टि दूर नहीं, यहाँ-यहीं, हमारी आँखों के सामने हो रही है। सवाल यह नहीं कि हम क्या महसूस करते हैं; सवाल यह है कि हम अपनी संवेदना को कार्रवाई में कैसे बदलते हैं। जब अगली बार 300 मौतें पढ़ें, तो ख़ुद से पूछें: क्या मैं अब भी केवल पढ़कर आगे बढ़ जाऊँगा?

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पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

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